लेखक परिचय

डॉ. सुमन कुमार दास (आध्यात्मिक नाम – स्वामी सुमनानन्द नाथ) प्रख्यात आध्यात्मिक विचारक, साधक और ललिता दिव्याश्रम—महाविद्या तांत्रपीठ, खजुराहो – के पीठाचार्य हैं। तीन दशकों से अधिक समय से वे मंत्र-योग, तंत्र-साधना, ध्यान, गृहस्थ-योग और नैसर्गिक जीवन-दर्शन पर शोध और मार्गदर्शन कर रहे हैं। उनकी साधना की मूल भावना है – “आध्यात्मिकता केवल पूजा नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है।”
ग्रामीण पुनर्जागरण, स्त्री-चेतना, आध्यात्मिक-कृषि और चरित्र-निर्माण को जोड़कर उन्होंने एक ऐसा समन्वित मॉडल विकसित किया, जिसमें साधना, परिवार, समाज और प्रकृति – चारों एक साथ प्रवाहित होते हैं।
उनकी पुस्तकों और प्रवचनों ने हजारों साधकों को आत्म-अनुशासन, करुणा, और वैज्ञानिक दृष्टि के साथ आध्यात्मिक मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया है। गहन अनुभव, सरल भाषा और संवादात्मक शैली उनकी लेखनी की विशेषता है, जहाँ परंपरा और आधुनिक चेतना एक-दूसरे को पूरक बनकर उभरती हैं।

पुस्तक परिचय

सीतायण  स्त्री-दृष्टि से रामकथा का एक गहन, संवेदनशील पुनर्पाठ है। यह पुस्तक सीता को केवल “त्याग और करुणा” की प्रतिमा नहीं मानती, बल्कि उन्हें चेतना, नियंत्रण-शक्ति और नैतिक साहस के रूप में प्रस्तुत करती है। कथा के प्रमुख प्रसंग – वन-वास, अशोक-वाटिका, अग्नि-परीक्षा और पृथ्वी-प्रवेश – यहाँ भीतर के मनो-युद्ध के रूप में देखे गए हैं, जहाँ सीता बिना शोर किए इतिहास की दिशा बदलती हैं।

यह ग्रन्थ बताता है कि धर्म केवल नियम नहीं – करुणा और न्याय का संतुलन है, और समाज तब पूर्ण होता है जब स्त्री केवल संरक्षित नहीं, बल्कि सहभागी बनती है। आधुनिक जीवन – घर, कार्यस्थल और संबंधों – में सीता-चेतना किस प्रकार मार्ग दिखाती है, यही इसका केंद्रीय संदेश है।

सीतायण  श्रद्धा और जागरूकता – दोनों को साथ लेकर चलती है, और पाठक को आमंत्रित करती है कि वह सीता को पूजे नहीं – पहले समझे, फिर अपने भीतर जगाए।