पुस्तक के बारे में
आज के डिजिटल युग में, विशेषकर 8 से 12 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए, यह पुस्तक केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि नैतिक शिक्षा, लोकज्ञान, मानवीय संवेदनाएँ और भारतीय संस्कृति की सुगंध भी लेकर आती है।
लगभग सत्तर वर्ष पहले के उस दौर में, जब मनोरंजन के साधन सीमित थे, दादी-नानी और गाँव के बुजुर्गों की कहानियाँ ही बच्चों की कल्पना, संस्कार और शिक्षा का आधार होती थीं। यह पुस्तक उसी युग और आधुनिक पीढ़ी के बीच एक भावनात्मक सेतु बनाने का विनम्र प्रयास है।
लेखक परिचय
राजेन्द्र प्रसाद त्रिपाठी राजस्थान के एक सेवानिवृत्त भौतिकी प्राध्यापक हैं। विज्ञान एवं शोध के क्षेत्र में लंबे समय तक कार्य करने के साथ-साथ उनकी रुचि साहित्य, लोकजीवन, संस्मरण लेखन तथा भारतीय लोककथाओं के संरक्षण में भी रही है।
लेखक ने अपने जीवन के अनुभवों, बचपन में बुजुर्गों से सुनी कहानियों तथा ग्रामीण भारत की लोकपरंपराओं को सरल और रोचक शैली में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।







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