पुस्तक के बारे में
अनुव्रत बंद्योपाध्याय “फ़हम” की तीसरी दीवान है “फ़र्द-ए-तमन्ना”। वक़्त के साथ ज़िंदा रहते-रहते खोने-पाने की कश्मकश में बस नाकामी ढेर करती है, जो चलकर वजूद पर सवाल उठाता है। जब यही ढेर बतौर राह-ख़र्च काम में लाया जाता है, तो बनती है एक फेहरिस्त ।
तहक़ीक़-ए-हक़ के दो मोड़, “वजूद-नामा” और “बा-वजूद” के बाद अबतक की जमी फ़र्द आपकी ख़िदमत में।
लेखक के बारे में
अनुव्रत बंद्योपाध्याय की पैदाईश बंगाल के नदिया जिले के कल्याणी शहर में १९९७ के २५ जून को हुई। मां विनीता एक मशहूर फनकारा हैं, पिता मुकुल बेद्योपाध्याय भी तख्लीक़ मिजाज़ के हैं। ये लगाव और हौसला घर से ही इब्तिदा होते हैं, हालांकि उसूलों पर चलने की कोशिश और दुनिया की थोपी दुनियादारी के पैदावार हैं “वजूद-नामा”, “बावजूद” और अब “फ़र्द-ए-तमन्ना”।
बदौलत पिता की नौकरी इन्होंने अपना बचपन बोकारो थर्मल, झारखण्ड में गुज़ारा। केंद्रीय विद्यालय में तालीम के दौरान ही बहुत से जुबानों में अदबिय्यात में दिलचस्पी पनपी, जिसे उस्तादों के हौसले और दर्स ने बंदगी बनाया।







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