About The Book

मैं कच्ची पगडंडी हूँ राहगीरों की
लोग गुज़ारते रहे मेरी छाती पर से
लहराता घास रौंद कर
गले पर आया कदम किसी का
आख़िर आवाज़ दें तो कैसे?