पुस्तक परिचय
'मुझे पुकारती हुई पुकार’ ४० कविताओं का एक ऐसा संग्रह है जो जीवन, अस्तित्व और मानवीय स्थिति का अन्वेषण बहुत ही गहनता से करता है। यह पुस्तक चार भागों में विभाजित: पहला भाग, आत्म-परिचय और पहचान स्थापित करने पर केंद्रित है, दूसरा आंतरिक द्वंद्व और आत्मचिंतन को समर्पित है, तीसरा समाज की आलोचना और व्यापक चिंतन पर, और चौथा भाग स्वीकार्यता, समाधान और आशा के स्वर को दर्शाता है।
यह पुस्तक समकालीन हिंदी कविता की शैली में नवाचार का प्रयास करती है। इसमें नैतिकता, एकाकीपन और अर्थकी खोज पर आधारित कविताएँ शामिल हैं, साथ ही कुछ कविताएँ प्रकृति और उसके साथ हमारे संबंध को भी उजागर करती हैं। यह पुस्तक जीवन के शोर में कुछ क्षणों का शांत चिंतन प्रदान करती है।
लेखक परिचय
25 वर्षीय सुशांत सौरभ, बिहार के एक छोटे से शहर बाँका के रहने वाले हैं। IISER भोपाल से उन्होंने भौतिकी में बीएस की पढ़ाई की है और वर्तमान में IISc में इंटर्निशप कर रहे हैं। बहुत ही कम उम्र से उन्हें उपन्यास, कहानियाँ, और कविताएँ पढ़ने का शौक रहा है। वे अक्सर किताबें छुपाकर घर में और कक्षा में पढ़ा करते थे। उन्हें विशेष रूप से दार्शनिक साहित्य और काव्य में गहरी रुचि है। हाल ही में वे अपने जीवन के कुछ सवालों के जवाब ढूँढने हिमाचल प्रदेश के एक गाँव, नड्डी में कुछ समय रहे। अपने अस्तित्व, उद्देश्य और जीवन के मायने जैसे प्रश्नों में उलझे हुए सुशांत, इनके उत्तरों की खोज में हैं और दास्तोयेवस्की, काफ्का, कामू, और मुक्तिबोध जैसे लेखकों से प्रेरित हो, पढ़ने और लिखने को अपने जीवन का अिभन्न हिस्सा बनाए रखना चाहते हैं।